Thursday, 15 December 2011

हकीकत से मुंह न छुपाए टीम अन्ना


बहुत पहले कहीं पढ़ा था कि किसी की एक आंसू पर हज़ारों दिल धड़कते हैं, किसी का उम्र भर रोना यूं ही बेकार जाता है. अन्ना हजारे और उनकी टीम ने जो आंदोलन खड़ा किया वो एक सशक्त और मजबूत लोकपाल बिल के लिए है। इसने भ्रष्टाचार के खिलाफ चल रहे आंदोलन को मजबूत किया है इसमें कोई दो राय नहीं । इस आंदोलन के बाद लोग सड़कों पर आए, सोई हुई क़ौम जाग गई , और सरकार की कुम्भकर्णी नींद टूटी इसमें भी कोई शक नहीं है। नई पीढ़ी पहली बार इतनी तादाद में सड़कों पर उतरी , सरकार के खिलाफ नारे लगाए और सरोकारों से जुड़ी ये भी आंदोलन की उपलब्धि ही है। कुल मिलाकर अरसे से जो भ्रष्टाचार के खिलाफ एक कड़े कानून बनाने की मांग चल रही थी उसे अन्ना हजारे के आंदोलन ने मजबूत किया।

लेकिन सवाल है कि लोकपाल को लेकर इतना हो हल्ला क्यों मचाया गया। क्या डेढ़ सौ साल पुरानी कांग्रेस घबरा गई या उसकी कोई सोची समझी रणनीति है। क्या लोकपाल कानून आने से चमत्कार हो जाएगा। क्या देश में पहले से मौजूद कई कानूनों में एक लोकपाल जुड़ जाएगा तो परिवर्तन हो जाएगा । नहीं लोकपाल की लड़ाई भ्रष्टाचार की निर्णायक लड़ाई नहीं है।


ये आंदोलन महज सरकार को एक चेतावनी भर हो सकती है परिवर्तन का इशारा नहीं हो सकता। क्योंकि हमारा मानना है कि दोष व्यवस्था का है। और वो व्यवस्था जो उदारीकरण के बाद से लगातार ही जल, जंगल और ज़मीन लूटने में लगी है। पहले उसे रोकना होगा। बहुराष्ट्रीय कंपनियों की खुली लूट रोकनी होगी। यूरोपिय मॉडल को दिन रात परोस रहे अश्लील टीवी के कार्यक्रमों में सुधार करना होगा। और पश्चिमी देशों के अंधाधुंध अनुकरण को रोकना होगा। राजनीति की आड़ में पनप रहे औधोगिक घरानों की लूट को बंद करा होगा। और पूंजी की राजनीति पर अंकुश लगाना होगा। संशाधनों को उन तक पहुंचाना होगा जो इसके वाजिब हक़दार हैं। टीम अन्ना चाहे तो इसमें सहयोग कर सकती है। हमारा ये मानना है, कि चाहे कितना भी महंगा बीज हो और चाहे कितना भी खाद डाला जाए फसल तब तक नहीं होगी जब तक ज़मीन सही नहीं की जाएगी। इसलिए व्यवस्था जब तक नहीं बदली जाएगी  तब तक लोकपाल कोई असर नहीं कर पाएगा।

एक और बात जो सबसे महत्वपूर्ण है वो ये है कि टीम अन्ना इस देश की सामाजिक हकीकत को स्वीकार करें। और देश का जो भौगोलिक और सामाजिक चेहरा है उसे नज़रअंदाज ना करे। आंदोलन और लोकपाल दोनों में पिछड़ों और दलितों की  पूरी भागीदारी दे। साथ ही सभी प्रदेशों से लोगों को हिस्सेदारी दे। इसके अलावा आदिवासियों और महिलाओं को भी उनकी हिस्सेदारी मिलनी चाहिए। लोकपाल कानून में उनके अधिकारों की बात भी होनी चाहिए। जो अभी तक टीम अन्ना की जुबान या कार्यशैली में नहीं दिखती।


राजेश कुमार ( लेखक टीवी पत्रकार हैं )


2 comments:

  1. Actually to make Lokpal ordinance into an Act and to make India an egalitarian society are to different issues. And, I personally think that it's not practical to try to solve all the political, social, judicial and administrative problems simultaneously. By the way reservation(on the basis of caste, creed or religion) isn't the solution of any national problem.

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