Sunday, 18 December 2011

गर चंद तवारीखी तहरीर बदल दोगे


एक बड़ा झटका अदम साहब नहीं रहे . जिस क्रांति को लिखते रहे बांचते रहे उसी अंदाज़ में चल दिए . पहली बार जब पढ़ा था तब से मुरीद हूँ . बिलकुल आग थी उनकी लेखनी . तब से कितनो को पढाया कितनो को सुनाया. अभी भी कई कतरने है उनकी कविताओं की. एक सच्ची कलम खामोश हो गई . अंत में यही कहना है.


धूल जैसे कदम से मिलती है,

ज़िन्दगी रोज़ हमसे मिलती है.

ऐसे लोग कितने है दुनिया में

जिन्हें शोहरत  कलम से मिलती है.



क्रांतिवीर कवी को शत शत नमन .



अदम साहब की एक रचना


गर चंद तवारीखी तहरीर बदल दोगे
क्या इनसे किसी कौम की तक़दीर बदल दोगे


जायस से वो हिन्दी की दरिया जो बह के आई
मोड़ोगे उसकी धारा या नीर बदल दोगे ?


जो अक्स उभरता है रसख़ान की नज्मों में
क्या कृष्ण की वो मोहक तस्वीर बदल दोगे ?


तारीख़ बताती है तुम भी तो लुटेरे हो
क्या द्रविड़ों से छीनी जागीर बदल दोगे ? 

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